नई दिल्ली। दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास रोके जाने, इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध तथा बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने दिल्ली पुलिस को अवमानना का नोटिस जारी किया है। अदालत ने दिल्ली में आवाजाही और इंटरनेट सेवा सामान्य करने, मेट्रो को नियमित समय-सारणी के अनुसार चलाने तथा अनावश्यक बैरिकेड हटाने के निर्देश दिए हैं। मामले में अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन लोगों को अपने पेशे से जुड़े काम करने और सामान्य आवाजाही में अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि बैरिकेड केवल उन्हीं स्थानों पर लगाए जाएं, जहां उनकी वास्तविक जरूरत हो। अदालत ने कोर्ट परिसर के बाहर धारा 163 से संबंधित बोर्ड हटाने का निर्देश भी दिया।
45 मेट्रो स्टेशनों पर रोक को लेकर कोर्ट ने मांगा जवाब
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास रोका गया तथा लगभग चार किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगाया गया। उन्होंने इसे अदालत के आदेशों की अवमानना बताते हुए हस्तक्षेप की मांग की।
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि दिल्ली मेट्रो के कुल 303 स्टेशनों में से 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास रोका गया था। उन्होंने अदालत को बताया कि सभी स्टेशन रविवार से पहले वाली रात 10 बजे तक पूरी तरह खोल दिए गए थे और मेट्रो सेवाएं सामान्य रूप से संचालित हो रही थीं।
इस पर पीठ ने सवाल किया कि पहले 57 स्टेशनों को बंद किए जाने की बात कही गई थी, जबकि अब 45 स्टेशनों का आंकड़ा दिया जा रहा है। अदालत ने पुलिस से यह स्पष्ट करने को कहा कि किन आधारों पर इन स्टेशनों को बंद करने का निर्णय लिया गया।
इंटरनेट सेवा और आवाजाही सामान्य करने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में इंटरनेट सेवाएं सामान्य रूप से बहाल करने और लोगों की आवाजाही सुचारू करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि लोगों को अपने पेशे से जुड़े कार्य करने से नहीं रोका जाना चाहिए। मेट्रो सेवाएं नियमित समय-सारणी के अनुसार चलाने और जगह-जगह लगाए गए बैरिकेड हटाने को भी कहा गया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरत के मुताबिक उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। हालांकि, ऐसे प्रतिबंध संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप होने चाहिए। सुनवाई में संविधान के अनुच्छेद 19(2) का भी उल्लेख किया गया।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार, लेकिन कानून का पालन जरूरी
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि नागरिकों को विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन की प्रक्रिया कानून के दायरे में होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन का अधिकार पुलिस कानून से ऊपर नहीं है।
जस्टिस वी. मोहना ने कहा कि यदि प्रदर्शनकारी जनहित को लेकर चिंतित हैं, तो उन्हें यह भरोसा देना चाहिए कि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे और किसी तरह की उकसावे वाली कार्रवाई नहीं करेंगे। अदालत ने प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत के बीच संतुलन पर जोर दिया।
पुलिस कार्रवाई और हिरासत को लेकर वकीलों ने उठाए सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, मेनका गुरुस्वामी, शादान फरासत और अन्य वकीलों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान वकीलों और अन्य लोगों को हिरासत में लिया गया तथा कुछ वकीलों को थानों में अपने मुवक्किलों से मिलने नहीं दिया गया।
शादान फरासत ने अदालत को बताया कि स्थिति बेहद गंभीर थी और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप जरूरी है। एन. हरिहरन और संजय हेगड़े सहित अन्य वकीलों ने भी वकीलों को काम करने से रोकने तथा पुलिस कार्रवाई से संबंधित शिकायतें रखीं। कुछ वकीलों ने पुलिसकर्मियों द्वारा नेम प्लेट या बैज नहीं लगाए जाने का मुद्दा उठाते हुए उनकी पहचान सुनिश्चित करने की मांग की।
अदालत ने कहा कि नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा करना उसकी जिम्मेदारी है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस को असीमित अधिकार नहीं मिल जाते।
7000 लोगों को हिरासत में लेने का दावा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से दावा किया गया कि प्रदर्शन के दौरान सात हजार से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें छात्र नेता, पत्रकार और अन्य लोग शामिल थे। वरिष्ठ वकील राकेश खन्ना ने भी आरोप लगाया कि दिल्ली के बाहर से आए सामान्य लोगों को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोकने के लिए जरूरत से ज्यादा कदम उठाए गए।
मेनका गुरुस्वामी ने पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार में हस्तक्षेप किया गया। उन्होंने हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या और कार्रवाई के आधार पर विस्तृत जवाब मांगे जाने की मांग की। ये आंकड़े और आरोप याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में रखे गए।
दिल्ली पुलिस ने कहा- हिरासत में लिए गए लोगों को छोड़ दिया गया
दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हिरासत में लिए गए कुछ लोगों को उसी दिन छोड़ दिया गया था। उनके मुताबिक, कुछ लोगों को दोपहर करीब दो बजे हिरासत में लिया गया और शाम छह बजे तक रिहा कर दिया गया। उन्होंने इसी आधार पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया।
तुषार मेहता ने कहा कि पुलिस की ओर से अनावश्यक रोक-टोक नहीं की गई और मेट्रो सेवाएं संचालित होती रहीं। उन्होंने यह भी बताया कि सभी स्टेशनों को रात 10 बजे से खोल दिया गया था। अदालत ने पुलिस के जवाब और याचिकाकर्ताओं की दलीलों को सुनते हुए मामले में आगे विचार करने की बात कही।
मंगलवार को फिर होगी सुनवाई
सुनवाई की शुरुआत में जस्टिस जॉयमाला बागची ने कहा कि पीठ असाधारण परिस्थितियों में रविवार को सुनवाई कर रही है और सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल सूचीबद्ध याचिकाओं पर सुनवाई की जाएगी, जबकि बिना सूचीबद्ध मामलों पर अलग से आदेश नहीं दिया जाएगा।
पीठ ने कहा कि लोगों के जीवन, स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर अदालत मामले की पूरी पड़ताल करेगी। अब इस मामले में मंगलवार को आगे सुनवाई होगी, जिसमें प्रतिबंधों, पुलिस कार्रवाई और अदालत के आदेशों के अनुपालन से जुड़े मुद्दों पर विचार किया जाएगा।
