नई दिल्ली: जातिगत आरक्षण को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। 21 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण के विरोध में प्रदर्शन हुए, जहां प्रदर्शनकारियों ने मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करने और आर्थिक आधार पर सरकारी सहायता देने की मांग की। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने आरक्षण की समीक्षा के नाम पर इसे खत्म करने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि आरक्षण PDA समाज का अधिकार है और रहेगा। अखिलेश ने क्रीमी लेयर और आरक्षण छोड़ने जैसी चर्चाओं को भी इसी बहस का हिस्सा बताया।

आरक्षण भारत में लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक बहस का विषय रहा है। सवाल यह है कि क्या आजादी के करीब आठ दशक बाद आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा होनी चाहिए या इसे खत्म किया जा सकता है? इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले महत्वपूर्ण दिशा देते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण खत्म करने पर क्या कहा?

आरक्षण की समाप्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख 28 जनवरी 2022 के जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता मामले में स्पष्ट हुआ था। तीन जजों की पीठ ने कहा था कि आरक्षण को पूरी तरह खत्म करने पर फैसला अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, क्योंकि यह विधायिका और कार्यपालिका के क्षेत्र का नीतिगत विषय है।

इसका मतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट आरक्षण की संवैधानिक वैधता, उसके लागू होने के तरीके और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं की समीक्षा कर सकता है, लेकिन आरक्षण रखना है या पूरी तरह समाप्त करना है, इसका अंतिम नीतिगत निर्णय संसद और सरकार के स्तर पर होगा। वहीं, 2024 में स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह मामले में संविधान पीठ ने अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण को कुछ शर्तों के साथ स्वीकार किया। अदालत ने कहा कि ऐसे वर्गीकरण को पर्याप्त प्रतिनिधित्व से जुड़े अनुभवजन्य आंकड़ों के आधार पर उचित ठहराना होगा।

आरक्षण गरीबी हटाने की योजना नहीं

आरक्षण को लेकर एक आम धारणा यह है कि यह गरीबी दूर करने की सरकारी योजना है। हालांकि संवैधानिक और कानूनी दृष्टि से आरक्षण का मूल उद्देश्य अलग है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि आरक्षण का उद्देश्य उन सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिलाना है, जो ऐतिहासिक रूप से शिक्षा, प्रशासन और सत्ता की संस्थाओं में पर्याप्त भागीदारी से वंचित रहे हैं। यानी आरक्षण को मूल रूप से आर्थिक सहायता योजना के बजाय सकारात्मक कार्रवाई और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के संवैधानिक माध्यम के तौर पर देखा जाता है।

संविधान में आरक्षण के क्या प्रावधान हैं?

भारतीय संविधान में आरक्षण और विशेष प्रावधानों से संबंधित कई अनुच्छेद हैं।

  • अनुच्छेद 15(4) और 15(5): सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा SC/ST के लिए शिक्षा में विशेष प्रावधान का आधार।
  • अनुच्छेद 16(4): सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होने पर पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान।
  • अनुच्छेद 16(4-A): SC/ST के लिए पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित प्रावधान।
  • अनुच्छेद 330 और 332: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC/ST के लिए सीटों के आरक्षण से संबंधित प्रावधान।
  • अनुच्छेद 335: सरकारी सेवाओं में SC/ST के दावों पर विचार करते समय प्रशासनिक दक्षता को ध्यान में रखने की बात।
  • अनुच्छेद 15(6) और 16(6): 103वें संविधान संशोधन के बाद आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत तक आरक्षण का प्रावधान।

क्या आरक्षण की कोई तय समय-सीमा है?

सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के लिए संविधान में ऐसी कोई एक समान समय-सीमा निर्धारित नहीं है कि एक निश्चित अवधि के बाद इसे स्वतः समाप्त कर दिया जाएगा। इसलिए केवल यह तर्क कि संविधान लागू हुए 75 साल हो चुके हैं, अपने आप में शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण समाप्त करने का आधार नहीं बनता।

हालांकि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में अलग प्रावधान हैं। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC/ST के लिए आरक्षित सीटों से संबंधित प्रावधानों में समय-सीमा तय की जाती रही है और संविधान संशोधनों के जरिए इसे आगे बढ़ाया गया है। 104वें संविधान संशोधन के बाद SC/ST के लिए राजनीतिक आरक्षण की अवधि संविधान लागू होने से 80 वर्ष तक बढ़ाई गई।

क्या संसद आरक्षण खत्म कर सकती है?

सुप्रीम कोर्ट के 2022 के रुख के अनुसार आरक्षण को पूरी तरह खत्म करने या बनाए रखने का फैसला नीतिगत क्षेत्र में आता है। इसलिए यह निर्णय न्यायपालिका के बजाय चुनी हुई सरकार और संसद के स्तर पर होना है। हालांकि संसद या सरकार द्वारा बनाई गई आरक्षण नीति भी संविधान के अधीन रहेगी। उसके प्रावधानों और लागू करने के तरीके को अदालत में चुनौती दी जा सकती है और न्यायपालिका उनकी संवैधानिक वैधता की जांच कर सकती है।

आरक्षण और वोटबैंक की राजनीति

आरक्षण केवल संवैधानिक और कानूनी मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध सामाजिक और चुनावी राजनीति से भी है। देश में अलग-अलग राजनीतिक दल समय-समय पर आरक्षण बढ़ाने, नए वर्गों को इसमें शामिल करने या आरक्षण के भीतर हिस्सेदारी तय करने की मांग करते रहे हैं। 2019 में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए 10 प्रतिशत EWS आरक्षण लागू किया जाना भी आरक्षण व्यवस्था के विस्तार से जुड़ा बड़ा कदम था। इससे आरक्षण की सीमा और संवैधानिक वैधता को लेकर अदालतों में कई सवाल उठे, जिन पर न्यायपालिका ने सुनवाई की।

अब असली सवाल क्या होना चाहिए?

आरक्षण को लेकर बहस केवल इसे खत्म करने या बनाए रखने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि किस वर्ग को कितना प्रतिनिधित्व मिला, कौन से समूह अभी भी पीछे हैं और आरक्षण का लाभ किन तबकों तक पहुंचा है। 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रमोशन में आरक्षण के संदर्भ में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़ों की जरूरत पर जोर दिया था। ऐसे में मौजूदा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर बहस करते समय आंकड़ों और वास्तविक प्रतिनिधित्व को आधार बनाना महत्वपूर्ण है।

केंद्रीय कर्मचारियों के आंकड़े क्या बताते हैं?

केंद्र सरकार के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक 80 मंत्रालयों और विभागों से मिले आंकड़ों में कुल केंद्रीय कर्मचारियों में SC की हिस्सेदारी 16.84 प्रतिशत, ST की 8.70 प्रतिशत और OBC की 26.32 प्रतिशत थी। वहीं ग्रुप-A के पदों में SC की हिस्सेदारी 14.20 प्रतिशत, ST की 6.54 प्रतिशत और OBC की 19.14 प्रतिशत बताई गई। ये आंकड़े बताते हैं कि प्रतिनिधित्व का सवाल केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे पद, कैडर और विभागवार आंकड़ों के आधार पर भी परखा जा सकता है।

आरक्षण पर आगे की बहस किस दिशा में?

देश में आरक्षण को लेकर दो प्रमुख सवाल सामने हैं क्या मौजूदा व्यवस्था सामाजिक प्रतिनिधित्व के अपने उद्देश्य को पूरा कर रही है और क्या बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार इसकी समय-समय पर समीक्षा जरूरी है? सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण खत्म करने का फैसला अपने हाथ में नहीं लिया है और इसे नीति निर्धारण का विषय माना है। ऐसे में आरक्षण में बदलाव, समीक्षा या समाप्ति का फैसला राजनीतिक और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही हो सकता है। वहीं अदालतें यह सुनिश्चित करती हैं कि आरक्षण से जुड़े फैसले संविधान और मौलिक अधिकारों की कसौटी पर खरे उतरें।