नई दिल्ली। क्या होता है जब मकई का एक बीज पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बिना बढ़ता है? नासा ने 1990 के दशक की शुरुआत में अंतरिक्ष शटल पर सूखे मकई के दानों को भेजकर इसका जवाब तलाशा। प्रयोग के दौरान बीज कक्षा में अंकुरित हुए और पौधे जीवित भी रहे। हालांकि, उनकी जड़ें और अंकुर पृथ्वी पर उगने वाले पौधों से बिल्कुल अलग तरीके से विकसित हुए।
माइक्रोग्रैविटी में मकई के पौधे स्पष्ट ऊपर और नीचे की दिशा में बढ़ने के बजाय उलझी हुई और अप्रत्याशित दिशाओं में बढ़े। यह खोज पृथ्वी से बाहर भोजन उगाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है और भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए अहम सुराग देती है।
अंतरिक्ष में मकई उगा, लेकिन कुछ अलग था
पृथ्वी पर मकई समेत अधिकांश पौधों की जड़ें नीचे की ओर बढ़ती हैं, जबकि अंकुर ऊपर की ओर बढ़ते हैं। पौधों की इस दिशात्मक प्रतिक्रिया को गुरुत्वाकर्षण के प्रति प्रतिक्रिया के रूप में जाना जाता है। गुरुत्वाकर्षण पौधों के लिए प्रमुख पर्यावरणीय संकेतों में से एक है, जो उन्हें अपनी दिशा तय करने में मदद करता है। लेकिन माइक्रोग्रैविटी में यह संकेत बेहद कमजोर हो जाता है। इसके चलते अंतरिक्ष में उगाए गए मकई की जड़ें और अंकुर असामान्य दिशाओं में विकसित हुए।
पौधों के लिए गुरुत्वाकर्षण क्यों है जरूरी?
पौधे सीधे तौर पर गुरुत्वाकर्षण को देख नहीं सकते। इसके बजाय उनकी कुछ विशेष कोशिकाएं यह पता लगाने में मदद करती हैं कि पौधा किस दिशा में स्थित है। यही संकेत जड़ों और अंकुरों को उनकी वृद्धि की दिशा तय करने में मदद करते हैं। माइक्रोग्रैविटी में सामान्य गुरुत्वाकर्षण संकेत काफी हद तक अनुपस्थित रहता है। ऐसे में पौधों को अपनी वृद्धि को सही दिशा देने के लिए प्रकाश जैसे दूसरे संकेतों पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है।
अंतरिक्ष में ज्यादा पौधे उगा रहा नासा
शुरुआती मकई प्रयोग के बाद नासा ने अंतरिक्ष में पौधों की वृद्धि को लेकर कई और अध्ययन किए हैं। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर नासा की वेजी प्रणाली के जरिए सलाद, चीनी गोभी, सरसों का साग, केल और झिनिया सहित कई पौधों को सफलतापूर्वक उगाया गया है। इसका उद्देश्य केवल प्रयोग करना नहीं है। भविष्य में पौधे लंबे अंतरिक्ष मिशनों के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों को ताजा भोजन और ऑक्सीजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक लाभ भी दे सकते हैं।
चंद्रमा और मंगल पर उगाई जा सकती हैं फसलें
भविष्य के अंतरिक्ष यात्री महीनों या वर्षों तक पृथ्वी से दूर रह सकते हैं। ऐसे में उनके लिए पूरा भोजन पृथ्वी से ले जाना चुनौतीपूर्ण होगा। स्थानीय स्तर पर फसलें उगाने से इस बोझ को कम किया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए पौधों को पृथ्वी से अलग परिस्थितियों में भी विकसित करना होगा। यही वजह है कि माइक्रोग्रैविटी में जड़ों और अंकुरों के व्यवहार को समझना भविष्य की अंतरिक्ष कृषि के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
